25 December 2017

ओ वासंती पवन हमारे घर आना

ओ वासंती पवन हमारे घर आना

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

एक थकन-सी थी नव भाव तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में
लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक, प्यारे-प्यारे रंगों में
बहुत दिनों के बाद ख़ुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

पतझर ही पतझर था मन के मधुबन में
गहरा सन्नाटा-सा था अंतर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर, भावों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरैया बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना

-कुँअर बेचैन

22 December 2017

भैया जी

["भैया जी" हर जगह मिल जाते हैं, गाँव में, कस्वों में, नगरों में, महानगरों में...... नित्यगोपाल कटारे जी के इस गीत में भैया जी की जो छवि उभरती है, वह आपके भी कहीं आस-पास की भी हो सकती है.....[ 


                         -शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

तीरथ चारों धाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

भैया जी का रौब यहाँ पर चलता है
हर अधिकारी भैया जी से पलता है
चाँद निकलता है इनकी परमीशन से
इनकी ही मरजी से सूरज ढ़लता है
दिखते बुद्धूराम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

पाँचों उँगली घी में और मुँह शक्कर में
कोई न टिकता भैया जी की टक्कर में
लिये मोबाइल बैठ कार में फिरते हैं
सुरा सुन्दरी काले धन के चक्कर में
व्यस्त सुबह से शाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

भैया जी के पास व्यक्तिगत सेना है
दुष्ट जनों को रोजगार भी देना है
चन्दा चौथ वसूली खिला जुआँ सट्टा
प्रजातन्त्र किसको क्या लेना देना है
करते ना आराम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

फ़रजी वोट जिधर चाहें डलवा देते
पड़ी ज़रूरत तुरत लट्ठ चलवा देते
भैया जी चाहें तो अच्छे अच्छों की
पूरी इज़्ज़त मिट्टी में मिलवा देते
कर देते बदनाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

बीच काम में जो भी अटकाता रोड़ा
अपने हिस्से में से दे देते थोड़ा
साम दाम से फिर भी नहीं मानता जो
भैया जी ने उसको कभी नहीं छोड़ा
करते काम तमाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

चोरी डाका बलात्कार या हत्या कर
पहुँच जाइये भैया जी की चौखट पर
नहीं कर सकेगा फिर कोई बाल बाँका
भैया जी थाने से ले आयेंगे घर
लेते पूरे दाम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

हिन्दू हो मुस्लिम हो या फिर ईसाई
सदा धर्म निरपेक्ष रहें अपने भाई
धन्धे में कुछ भी ना भेद भाव करते
कोई विदेशी हो या कोई सगा भाई
नहीं है नमकहराम हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

जो भैया जी स्तोत्र सुबह सायं गाते
सड़क भवन पुलियों का ठेका पा जाते
भक्ति भाव से भैया जी रटते-रटते
अन्तकाल में खुद भैया जी बन जाते
इतने शक्तिमान हमारे भैया जी
कर देते सब काम हमारे भैया जी ।।

-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

15 November 2017

कविता की जरूरत

बहुत कुछ
 दे सकती है कविता
क्यों कि
बहुत कुछ
 हो सकती है कविता
ज़िन्दगी में

अगर हम
जगह दें उसे
जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़
जैसे तारों को जगह देती है रात

हम बचाये रख सकते हैं
उसके लिए
अपने अन्दर कहीं
ऐसा एक कोना
जहाँ ज़मीन और आसमान
जहाँ आदमी और भगवान के बीच दूरी
कम से कम हो

वैसे कोई चाहे तो जी सकता है
एक नितान्त कवितारहित ज़िन्दगी
कर सकता है
कवितारहित प्रेम

-कुँवर नारायण

25 September 2017

धधक कर किसी की चिता जल रही है

अन्धेरी निशा में नदी के किनारे
धधक कर किसी की चिता जल रही है

धरा रो रही है, बिलखती दिशाएँ
असह वेदना ले गगन रो रहा है
किसी की अधूरी कहानी सिसकती
कि उजड़ा किसी का चमन रो रहा है
घनेरी नशा में न जलते सितारे
बिलखकर किसी की चिता जल रही है

चिता पर किसी की उजड़ती निशानी
चिता पर किसी की धधकती जवानी
किसी की सुलगती छटा जा रही है
चिता पर किसी की सुलगती रवानी
क्षणिक मोह-ममता जगत को बिसारे
लहक कर किसी की चिता जल रही है

चिता पर किसी का मधुर प्यार जलता
किसी का विकल प्राण, श्रृंगार जलता
सुहागिन की सुषमा जली जा रही है
अभागिन बनी जो कि संसार जलता
नदी पार तृण पर अनल के सहारे
सिसक कर किसी की चिता जल रही है

अकेला चला था जगत के सफर में
चला जा रहा है, जगत से अकेला
क्षणिक दो घड़ी के लिए जग तमाशा
क्षणिक मोह-ममता, जगत का झमेला
लुटी जा रही हैं किसी की बहारें
दहक कर किसी की चिता जल रही है

-सरयू सिंह सुन्दर

24 September 2017

ग़मों को सहते ही रहने की

ग़मों को सहते ही रहने की आदत छोड़ आया हूँ
जहाँ पर पाँव जलते थे, मैं वो छत छोड़ आया हूँ

ये चीज़ें भूल जाने की मेरी आदत का क्या कीजे
मैं तेरे दिल में अपने दिल की दौलत छोड़ आया हूँ

'बया' चिड़िया हूँ, औरों के ही मुझको घर बनाने हैं
मैं हर तिनके पे लिख-लिख कर 'मुहब्बत' छोड़ आया हूँ

तू खुद को आईने में देखकर, जब चाहे पढ़ लेना
तेरी आँखों में, जो भी प्यार के ख़त छोड़ आया हूँ

किसी को क्या पता, कितने दिलों के काग़ज़ों से मैं
फ़साना बनके लौटा हूँ, हक़ीक़त छोड़ आया हूँ

रहेगा बचपना जब तक, रहेगी ज़िन्दगी उनमें
बड़ों में नन्हे बच्चों-सी शरारत छोड़ आया हूँ

मुझे अब उम्र भर तदबीर से ही काम लेना है
न जाने कौन से हाथों में क़िस्मत छोड़ आया हूँ

पता भी है तुझ्रे दुनिया, कि तेरे इश्क़ की ख़ातिर
ख़ुदा ने मुझको बख़्शी थी, वो ज़न्नत छोड़ आया हूँ

'कुँअर' कुछ लोग रुसवा भी करेंगे, इतना तो तय है
मैं इस दुनिया की गलियों में जो शोहरत छोड़ आया हूँ

-कुँअर बेचैन

17 September 2017

साली

 -गोपालप्रसाद व्यास

तुम श्लील कहो, अश्लील कहो
चाहो तो खुलकर गाली दो
तुम भले मुझे कवि मत मानो
मत वाह-वाह की ताली दो
पर मैं तो अपने मालिक से
हर बार यही वर माँगूँगा-
तुम गोरी दो या काली दो
भगवान मुझे इक साली दो

सीधी दो, नखरों वाली दो
साधारण या कि निराली दो
चाहे बबूल की टहनी दो
चाहे चंपे की डाली दो
पर मुझे जन्म देने वाले
यह माँग नहीं ठुकरा देना
असली दो, चाहे जाली दो
भगवान मुझे एक साली दो

वह यौवन भी क्या यौवन है
जिसमें मुख पर लाली न हुई
अलकें घूँघरवाली न हुईं
आँखें रस की प्याली न हुईं
वह जीवन भी क्या जीवन है
जिसमें मनुष्य जीजा न बना
वह जीजा भी क्या जीजा है
जिसके छोटी साली न हुई

तुम खा लो भले प्लेटों में
लेकिन थाली की और बात
तुम रहो फेंकते भरे दाँव
लेकिन खाली की और बात
तुम मटके पर मटके पी लो
लेकिन प्याली का और मजा
पत्नी को हरदम रखो साथ
लेकिन साली की और बात

पत्नी केवल अर्द्धांगिन है
साली सर्वांगिण होती है
पत्नी तो रोती ही रहती
साली बिखेरती मोती है
साला भी गहरे में जाकर
अक्सर पतवार फेंक देता
साली जीजा जी की नैया
खेती है, नहीं डुबोती है

विरहिन पत्नी को साली ही
पी का संदेश सुनाती है
भोंदू पत्नी को साली ही
करना शिकार सिखलाती है
दम्पति में अगर तनाव
रूस-अमरीका जैसा हो जाए
तो साली ही नेहरू बनकर
भटकों को राह दिखाती है

साली है पायल की छम-छम
साली है चम-चम तारा-सी
साली है बुलबुल-सी चुलबुल
साली है चंचल पारा-सी
यदि इन उपमाओं से भी कुछ
पहचान नहीं हो पाए तो
हर रोग दूर करने वाली
साली है अमृतधारा-सी

मुल्ला को जैसे दुःख देती
बुर्के की चौड़ी जाली है
पीने वालों को ज्यों अखरी
टेबिल की बोतल खाली है
चाऊ को जैसे च्याँग नहीं
सपने में कभी सुहाता है
ऐसे में खूँसट लोगों को
यह कविता साली वाली है

साली तो रस की प्याली है
साली क्या है रसगुल्ला है
साली तो मधुर मलाई-सी
अथवा रबड़ी का कुल्ला है
पत्नी तो सख्त छुहारा है
हरदम सिकुड़ी ही रहती है
साली है फाँक संतरे की
जो कुछ है खुल्लमखुल्ला है

साली चटनी पोदीने की
बातों की चाट जगाती है
साली है दिल्ली का लड्डू
देखो तो भूख बढ़ाती है
साली है मथुरा की खुरचन
रस में लिपटी ही आती है
साली है आलू का पापड़
छूते ही शोर मचाती है

कुछ पता तुम्हें है, हिटलर को
किसलिए अग्नि ने छार किया
या क्यों ब्रिटेन के लोगों ने
अपना प्रिय किंग उतार दिया
ये दोनों थे साली-विहीन
इसलिए लड़ाई हार गए
वह मुल्क-ए-अदम सिधार गए
यह सात समुंदर पार गए

किसलिए विनोबा गाँव-गाँव
यूँ मारे-मारे फिरते थे
दो-दो बज जाते थे लेकिन
नेहरू के पलक न गिरते थे
ये दोनों थे साली-विहीन
वह बाबा बाल बढ़ा निकला
चाचा भी कलम घिसा करता
अपने घर में बैठा इकला

मुझको ही देखो साली बिन
जीवन ठाली-सा लगता है
सालों का जीजा जी कहना
मुझको गाली-सा लगता है
यदि प्रभु के परम पराक्रम से
कोई साली पा जाता मैं
तो भला हास्य-रस में लिखकर
पत्नी को गीत बनाता मैं ।

-गोपाल प्रसाद व्यास

05 September 2017

आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ


(हिन्दी माह में पूर्व वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय की एक कविता सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए)

स्वरों व्यंजनों से परिनिष्ठत, है वर्णों की माला,
शब्द-शब्द अत्यन्त परिष्कृत, देते अर्थ निराला
उच्चकोटि के भाव निहित हैं, नित प्रेरणा जगाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ

व्यक्त विचारों को करने का, यह सशक्त माध्यम है,
देवनागरी लिपि अति सुन्दर सर्वश्रेष्ठ उत्तम है
इसकी हैं बोलियाँ बहुत सी इसे समृद्ध बनाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ

उच्चारण, वर्तनी सभी में, इसको सिद्धि मिली है,
है व्याकरण परम वैज्ञनिक, पूर्ण प्रसिद्धि मिली है
इसके अदर सम्प्रेषण का अनुपमय गुण पाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ

हिन्दी सरल, सुबोँ, सरस है नहीं कहीं कठिनाई,
जो भी इसे सीखना चाहें, लक्ष्य मिले सुखदाई
काम करें हम सब हिन्दी में इसकी ख्याति बढ़ाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ


कवियों ने की प्राप्त प्रतिष्ठा, रच कविता कल्याणी
गूँज रही है अब भी उनकी, पावन प्रेरक वाणी
हम इसकी साहित्य-सम्पदा, भूल न किंचित जाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ

ओजस्वी कविताएँ लिखकर अमर चन्द बरदाई,
अमिट भक्ति की धारा तुलसी ने सर्वत्र बहाई
सूर, कबीर, जायसी की भी कृतियाँ हृदय लुभाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ

केशव, देव, बिहारी, भूषण के हम सब आभारी,
रत्नाकर, भारतेन्दु उच्च पद के सदैव अधिकारी
महावीर, मैथिलीशरण, हरिऔध सुकीर्ति कमाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ

पन्त, प्रसाद, महादेवी का योगदान अनुपम है,
देन ‘निराला’ की हिन्दी को परम श्रेष्ठ उत्तम है
दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्र-भक्ति उपजाएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ

करें प्रयोग नित्य हिन्दी का, रक्खें अविचल निष्ठा,
ऐसा करें प्रयास कि जिससे, जग में मिले प्रतिष्ठा
हिन्दी का ध्वज अखिल विश्व में मिलजुल कर फहराएँ
आओ आओ हिन्दी भाषा हम सहर्ष अपनाएँ
--
         -विनोद चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’
आई.ए.एस.(अ.प्रा.)
पूर्व निदेशक
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ

12 August 2017

डा० स्टेला कुजूर के हाइकु

उडूँ कैसे मैं
पंख तोड़ दिये हैं
ताक में बाज़

***

कहाँ रुके हैं
सितमगर वाण
कला के शत्रु

***

ढेकी कूटती
वह आदिवासिनि
जीवन्त कला

***

वनों में छूटे
पढ़ाई की भूख में
सब अपने

***

झलक रहा
दीये की रोशनी में
माँ का वदन

***

अँधेरी रात
फटी चटाई पर
ज़ख्मी सपने

***

नदी के पार
गूँजता अनहद
जलपाखी-सा

***

लौट आने को
करता मनुहार
अपना गाँव

***

बर्फ जमीं थी
सदियों के रिश्तों में
पिघल बही

***

अकेला राही
घुमावदार रास्ता
वर्षा का पानी

***

विजन वन
गरजता बादल
घना जंगल

***

अँगीठी पर
माँ खुद को पकाती
ख्वाब बुनती

***

रेंगने लगी
बेटे की पीठ पर
आहत हवा

***

एक ही छत
सब हैं साथ-साथ
अनजाने से

-डा० सूरजमणि स्टेला कुजूर

दृग देख जहाँ तक पाते हैं

दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है
फिर भी उस पार खड़ा कोई, हम सबको टेर बुलाता है
मैं आज चला, कल आओगे तुम, परसों सब संगी-साथी
दुनिया रोती-धोती रहती, जिसको जाना है जाता है ।

                                           -हरिवंश राय बच्चन

14 July 2017

देहरी पर नहीं आये


हवा आयी
गंध आयी
गीत भी आये
पर तुम्हारे पाँव
देहरी पर नहीं आये


अब गुलाबी होंठ से
जो प्यास उठती है
वह कंटीली डालियों पर
सांस भरती है
नील नभ पर
अश्रु–सिंचित
फूल उग आये


तितलियों की
धड़कने
चुभती लताओं पर
डोलती चिनगारियाँ
काली घटाओं पर
इन्द्रधनु–सा
झील में
कोई उतर आये

झर रहे हैं चुप्पियों की
आँख से सपने
फिर हँसी के पेड़ की
छाया लगी डसने
शब्द आँखों से
निचुड़ते
आग नहलाये

–डॉ० ओम प्रकाश सिंह